हम से मैं…

हम से मैं...

मैं से हम की मसाफ़त तय हुई मुख्तसर
हम से मैं के सफर में ज़माने गुज़र गये
– कृत्या

(Going from “I” to “we” seemed like a short and simple journey
But going back from “we” to “I” is taking a really long time)

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खयाली सवाल …

लड़ झगड़ कर किस्मत के तारों से, गर मैं गुज़र सकी उन गलियारों से

जहां तुम अक्सर टेहेलते हो, फकार में गिरते संभलते हो

मैं पेहचान लूँ तुम्हे तुम्हारी चाल से, ज़रा बताना कैसे चलते हो

क्या नज़रें मिलाते हो हमकदम से, या अपनी पलकें झुकाये चलते हो?

मुस्कुरा लेते हो खयालों में यूं ही, या संजीदगी रुख पे सजाये चलते हो?

आहटें परेशान करती हैं तुम्हे, या ज़हन के सवालों की भीढ़ में चलते हो?

गुदगुदाते लम्हों की शोखी है चाल में, या गुज़रते वक़्त की सीध में चलते हो?

कफ-ए-दस्त छुपा लेते हो जेबों में, या उन्हे बाद-ए-सबा में फैलाये चलते हो?

रात सा ठेहराव है तुम्हारी रफ़्तार में, या ढलते दिन की तेज़ी से चलते हो?

किसी के साथ चल के भी तन्हा होते हो, या तन्हाई को साथ लेके चलते हो?

क्या बदल जायेगा मगर, तेरे जवाब और मेरे सवालों से

सच कब बदला है आखिर बेबुनियाद खयालों से

हमारे जहान, हमारी राहें इस क़दर जुदा है की हमारे ख्वाबों में भी

ना कभी मैं तुम्हारे साथ चलती हूँ, ना तुम ही मेरे साथ चलते हो

-कृत्या

वो केहते हैं..

वो केहते हैं मशरूफ़ रहूं मैं दुनिया जहाँन की बातों में

फिलहाल मुझे उनसे परे दुनिया नज़र नहीं आती


वो केहते हैं मेरा तवज्‍जु उन्हे परेशान करता है

उनकी आँखें खुलने तक पर नींद मुझे नहीं आती


वो केहते हैं मेरी की हुई हर तारीफ खयाली लगती है 

उससे बढ़कर सादिक बात मुझे करनी मगर नहीं आती

 

वो केहते हैं मेरी खामोशी से उन्हे फ़र्क़ नहीं पड़ता ज़्यादा

इतनी बेपरवाही से मुझे मोहब्बत निभानी नहीं आती

 

वो केहते हैं मेरे खत से उन्हे शिकवों की बू आती है 

उनके बेनियाज़ दिल को शायद मेरी उंसियत समझ नहीं आती 

 

वो केहते हैं मैं इतनी शिद्दत से इबादत ना करूं उनकी

लाख़ कोशिशें कर ली मैने पर ये आदत नहीं जाती 

 

उनकी तरह मुझे नहीं है जज़्बातों को काबू में रखने का तजुर्बा

अपने जुनून को हद्द में रखने की अदा मुझे नहीं आती

 

– कृत्या

Flipped sun set :)

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It was time for the day to leave, the sun-kissed the horizon good-bye. Meanwhile the sky and the unusually calm lake held on to the few last fragments of light, some souvenirs from the parting day, the purple clouds, the orange horizon and the blue voids. Soon night would take over, dyeing everything that came in its way in black, its favorite color…but where will it start? With the water or the sky?  Well it knows the rules of the game, it knows if it starts with the sky, half its work will get done automatically 🙂 but they look the same this evening, it is going to be a tough game today.