तवह्हुम….

मैं ऊन के गोले लेके चलूँ, तुम फूलों को संग कर लेना
मैं यूँ ही राहें बुनती चलूँ , तुम मनचाहे रंग लेना 

मैं वक्त से लम्हे चुनती हुई, मिल जाऊँ तुम्हे चौराहे पे
तुम का निपटा के सब दिन के, मेरी गली से एक दफा गुजर लेना
मैं यूँ ही राहें बुनती चलूँ, तुम विर्द के कुछ रंग लेना

जब मेरे गालों पे भँवर डे या तेरी हँसी आँखों से छल जाए
मैं से कलायी आगे कर दूँ, तुम घड़ी कि सुई पकड़ लेना
मैं यूँ ही राहें बुती चलूँ, तुम निशात के कुछ रंग लेना

जब र्ज़, कार, दुनियादारी तखय्युल पे भारी पड़ने लगे
तुम कुछ मीय की खामोशी से, रुकने का इशारा कर देना
मैं फि भी राहें बुनती चलूँ, तुम सुक़ूत के कुछ रंग लेना

जो साथ चलना मुमकिन ना लगे, जब मस्ले द्द से बढ़ने लगे
मुझे जरा सा पीछे कर देना, या तुम ज़रा सा पीछे हो लेना
मैं नए सिरे से राहें बुनू, तुम वो मक्रूह रंग बदल देना

फिर मैं ऊन के गोले लेके चलूँ, तुम फूलों को संग कर लेना
मैं यूँ ही राहें बुनती चलूँ , तुम मनचाहे रंग भर लेना

कृत्या

2 thoughts on “तवह्हुम….

    • Thank you, coming from someone who understands and appreciates poetry, that is a big compliment….
      publishing my poems never crossed my mind though….but a writer friend of mine suggested the same a few days back, I should give it a thought I guess, whats the harm in trying anyway….there she goes again, TMI🙂

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