तुम आज भी अजनबी हो

घड़ी को लगता है कि तुम्हे कुछ कुछ समझने लगी हूँ
और फिर घड़ी में यूँ लगता है तुम आज भी अजनबी हो

इतनी मोहब्बत कैसे लेते हो तुम लोगों से
इतनी सफयी से फिर कैसे मुकर जाते हो ?
अपनी खामोशी में इतने लफ्ज़ समेटे चलते हो
फिर न्द बातों में ही बिखर जाते हो

नफ्स्परस्त होने का दावा तुम करते हो
और गैर के कुल्फत से भी मुज़्तर हो जाते हो
मासूमियत ऐसी कि तसव्वुर में खो जाते हो
बसीरत इतनी कि वक्त रेहते संभल जाते हो

बीती बातों कि जमीयत अज़ीज़ भी है तुम्हे
माज़ी के ख्याल से डर से जाते हो
दिन को रेज़ा रेज़ा बाँट देते हो यादों में
फिर एक लम्बे अर्से की तरह गुजर जाते हो

घड़ी भर को लगता है कि तुम्हे कुछ कुछ समझने लगी हूँ
और फिर घड़ी भर में यूँ लगता है तुम आज भी अजनबी हो

कृत्या

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2 thoughts on “तुम आज भी अजनबी हो

    • Aww! Thanks Jyotsna! I am glad you found my blog enjoyable.
      I too have a sad excuse for a dictionary in one of the blog posts, may be I should update it and add more words after all. Thanks for the reminding me of it 🙂

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