वो केहते हैं..

वो केहते हैं मशरूफ़ रहूं मैं दुनिया जहाँन की बातों में

फिलहाल मुझे उनसे परे दुनिया नज़र नहीं आती


वो केहते हैं मेरा तवज्‍जु उन्हे परेशान करता है

उनकी आँखें खुलने तक पर नींद मुझे नहीं आती


वो केहते हैं मेरी की हुई हर तारीफ खयाली लगती है 

उससे बढ़कर सादिक बात मुझे करनी मगर नहीं आती

 

वो केहते हैं मेरी खामोशी से उन्हे फ़र्क़ नहीं पड़ता ज़्यादा

इतनी बेपरवाही से मुझे मोहब्बत निभानी नहीं आती

 

वो केहते हैं मेरे खत से उन्हे शिकवों की बू आती है 

उनके बेनियाज़ दिल को शायद मेरी उंसियत समझ नहीं आती 

 

वो केहते हैं मैं इतनी शिद्दत से इबादत ना करूं उनकी

लाख़ कोशिशें कर ली मैने पर ये आदत नहीं जाती 

 

उनकी तरह मुझे नहीं है जज़्बातों को काबू में रखने का तजुर्बा

अपने जुनून को हद्द में रखने की अदा मुझे नहीं आती

 

– कृत्या

9 thoughts on “वो केहते हैं..

  1. mindblowing ! I became fan of u now. I never saw anyone who are so good to express feelings the way u do it. Simply great

  2. Hi Krithya ,,

    i became fan of yours when i read this “Wo Kahte Hai”…its realy awesome and touchy lines.

    i also use to write gajals and poems……..

  3. Wo Kahte hai ki unhe mere khwabo me ana pasand nahi ata,
    magar hame bina unke tassavur ke raat katni nahi ati…..

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