खयाली सवाल …

लड़ झगड़ कर किस्मत के तारों से, गर मैं गुज़र सकी उन गलियारों से

जहां तुम अक्सर टेहेलते हो, फकार में गिरते संभलते हो

मैं पेहचान लूँ तुम्हे तुम्हारी चाल से, ज़रा बताना कैसे चलते हो

क्या नज़रें मिलाते हो हमकदम से, या अपनी पलकें झुकाये चलते हो?

मुस्कुरा लेते हो खयालों में यूं ही, या संजीदगी रुख पे सजाये चलते हो?

आहटें परेशान करती हैं तुम्हे, या ज़हन के सवालों की भीढ़ में चलते हो?

गुदगुदाते लम्हों की शोखी है चाल में, या गुज़रते वक़्त की सीध में चलते हो?

कफ-ए-दस्त छुपा लेते हो जेबों में, या उन्हे बाद-ए-सबा में फैलाये चलते हो?

रात सा ठेहराव है तुम्हारी रफ़्तार में, या ढलते दिन की तेज़ी से चलते हो?

किसी के साथ चल के भी तन्हा होते हो, या तन्हाई को साथ लेके चलते हो?

क्या बदल जायेगा मगर, तेरे जवाब और मेरे सवालों से

सच कब बदला है आखिर बेबुनियाद खयालों से

हमारे जहान, हमारी राहें इस क़दर जुदा है की हमारे ख्वाबों में भी

ना कभी मैं तुम्हारे साथ चलती हूँ, ना तुम ही मेरे साथ चलते हो

-कृत्या

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