जिसका डर था वही हुआ

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तुम मुसलसल हाथ मिलाते रहे

हम बारहा हाथ छुड़ाते रहे

तुम्हे डर ये की मोहब्बत के रंग

फींके ना पड़ जाये मेरे हाथो में

हमे डर ये की फ़लाक़त की लक़ीरें

मुन्तकिल ना हो जाये तेरे हाथो में 

ज़िंदगी के नशेब-ए-फ़राज़ में

फिर हाथ फिसलते रहे

कुछ मोहब्बत जाती रही

कुछ फ़लाक़त आती रही

आखिर जिसका डर था वही हुआ

ना हाथ मिला ही सके, ना हाथ छुड़ा ही सके

राएगां कोशिशों में गुज़ार दी दोनो ने ज़िंदगी

कृत्या