फरामोशी-ए-रोज़-अफ़्ज़ूँ (forgetting by the day)

IMG_8498Choosing gradual forgetfulness over eternal remembrance probably gives life another chance to live.

लगता है ज़िंदगी अब तेरे बिना भी कट जायेगी

दीवार पर सजी तेरी तस्वीरों ने तेहखाने का रास्ता ढूंढ लिया है

उनमें क़ैद  लम्हों से, अब पेहले सी गुफ्तगू नहीं होती

रेडियो पड़ा रेहता है मेज़ पर क़दीम खिलौने की तरह

अब नज़्मों और ग़ज़लों से, तेरी यादें रूबरू नहीं होती

जिनकी बातों में अक्सर तेरा ज़िक्र हुआ करता था

उन लोगों से अब पेहले सी सोहबत नहीं होती

फोन की घंटी बजने पर तजस्सुस नहीं होता

तेरी आवाज़ ना सुनकर अब हैरत नहीं होती

तेरे नाम का, तेरे लेहजे का मिल जाये भी अगर कोई

दिल के तेज़ धड़कने की अब जुर्रत नहीं होती

हाँ दुआ में तेरा नाम आदतन आ जाया करता था

कोई दुआ मांगने की पर अब हिम्मत नहीं होती

लगता है ज़िंदगी अब तेरे बिना भी कट जायेगी

आखिर,

हर क़ुर्बत, फुरक़त में जलकर बरबाद नहीं होती

हर मोहब्‍बत शेहेर-ए-अज़ल में आबाद नहीं होती

 -कृत्या

 

 

 

7 thoughts on “फरामोशी-ए-रोज़-अफ़्ज़ूँ (forgetting by the day)

  1. OMG! it seems you have penned down every single thought of mine.. could not have written such beautifully though!
    bas yuhn hai ki jikr kam hota ja raha hai .. par sanson mein to ab hi tum hi tum ho .. sirf tum .. sirf tum!🙂

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