ग़ुरूब (Sunset)

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कभी देखा है दिन को ढलते हुए?

एक लकीर में सिमट जाती है बेचैन अर्श की अंगड़ियाँ जैसे

एक लकीर में सिमट जाती है मुतमइन फर्श की गहराइयाँ जैसे

वहीं उस उफ़ुक़ में मिल गयी हैं, हमारी पहली और आखरी मुलाक़ात की घड़ियाँ

एक लकीर ने तक़्सीम कर दी हम दोनो की तनहाईयाँ जैसे

 

उस उफ़ुक़ पर हर रोज़ तेरा तसव्वुर, भिड़ जाता हैं यादों के लुटेरों से

कभी फ़तेह मिलती है ज़ख़्मी तसव्वुर के दम पर

कभी शिकस्त की आड़ में यादें खो जाया करती हैं

दोनो ही सुरतों में तेरा वजूद मेरी ज़िंदगी से मिटने लगता है

 

अरसा-ए-जंग के इंतिहा पे,

मैं बिखरे तखय्युल के उधड़े सिरे चुन लेती हूँ

एक कच्ची-पक्की दास्तान हमारी फिर बुन लेती हूँ

कुछ हिस्से उस अफ़साने के आज भी महफूज़ है ज़ेहन में,

कुछ क़िस्से अब मगर सराबज़ार लगते हैं

 

मैं उन सराबों का पीछा करते हुए

सरहद-ए-होश पर आ पहुँची हूँ

यहाँ हर मुसाफिर मेरी ही तरह बदहाल है

किसे अब याद की ख़यालों में कितनी हक़ीक़त है,

किसे अब इल्म की हक़ीक़त में कितने ख़याल हैं

 

एक लकीर में सिमट आई हो हक़ीक़त की नाकामियाँ जैसे

एक लकीर में सिमट आई हो ख़यालों की नादानियाँ जैसे

कभी देखा है दिन को ढलते हुए?

हमारे रिश्ते जैसा लगता है

– कृत्या

अर्श – sky, मुतमइन – calm and content, फर्श – Earth, उफ़ुक़ – Horizon, तक़्सीम करना – to divide, अरसा-ए-जंग – duration of war, सराबज़ार – like a mirage, सराबों – mirages, सरहद-ए-होश – borders of rationality

4 thoughts on “ग़ुरूब (Sunset)

    • Hi Shi
      Yes I did write this. I am not sure if I can speak urdu fluently (though some day I would love to), probably enough to hold a conversation, but I love the language, and try understanding it ( although all the urdu I know feels like the tip of an iceberg🙂 )
      What about you? Where are you from? Do you speak Urdu?
      Thanks for dropping by, hope you visit again.
      Cheers
      Krithya

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