इंतज़ार (II)

Dec20161-001.jpg

सुनी जाती है हामी भर भर के हमराहों की दास्तान
रिश्तों की, तकरारों की, बनती गिरती सरकारों की
खेलों और खिलाड़ियों की, फिल्मों की कहानियों की
अमन की, लड़ाई की, बढ़ती हुई महँगाई की
मैं भी सग़ीर बातों से, गुफ़्तुगू भर देती हूँ
मेरे चंद नज़रियों को कुछ इत्मिनान हो जाता है
मेरी ख़ामोशी को मगर आज भी, तेरे तवज्जो का इंतज़ार रहता है
– कृत्या