मुंतज़िर

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सर्द हवाओं से उलझ पड़ते हैं सूनी दरख्तों के ढाँचे
मुसलसल बादलों से लड़ती रहती है जाड़ों की गुनगुनी धूप
दराज़ रातों के बीच अब सिमटते दिन का जैसे दम निकलने लगा हो
तुम आ जाओ या अपने कुछ सुखन लौटते परिंदों के हवाले कर दो
सुना है तुम्हारी आमद से मौसम बदल जाया करते हैं
सुना है तुम्हारी बातों में रातें गुज़र जाया करती हैं
– कृत्या