बाज़-दीद ( A return visit)

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मुद्दतों बाद लौटे हो,

जो तेरे आमद की खबर होती, तो तेरी यादों का इत्र छिड़क दिया होता पर्दों और ग़िलाफों पे

मायूसियत की बू दर-ओ-दीवार पर कब्ज़ा कर बैठी  है

जो तेरे आमद की खबर होती,  तो तेरी कुछ हिकायतों से दर-दरीचे रंग दिए होते

अर्सा-ए-हिज्र की मोटी सी परत आशनाई के सब रंग निगल गयी है

मुझे आइना देखे हुए भी बड़े दिन हो गए हैं

गुज़रा वक़्त सिमट आया है रू के सिलवटों में

पिछली बारिशों में पलकों के पुल टूट गए थे

इंतजार के कई मौसम बह गए

आँखों के किनारे कुछ धस से गए हैं

हाँ सफ़ेद होती ज़ुल्फ़ों की गिरहों में मैंने

क़ैद कर रखी है चांदनी तनहा रातों की

और चटपटे अचार की मर्तबान में सब से छुपाकर

थोड़ी सी ज़िन्दगी बचा रखी है

आओ बैठो, खुलती गिरहों की रौशनी में,

कुछ लम्हे परोस दूँ

-कृत्या

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