बस एक अटैची (just one suitcase)

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बस एक  अटैची में समेट लाए थे ,हर ज़रूरत ज़िंदगी की

नयी पुरानी कमीज़ों के सिलवटों में, तवज्जु  मालूफ हाथों का

वो गुल-पोश चादर और  उसमें बिखरी हुई, करवटें अलसाई  सुबहों  की

तकिये के गिलाफो के सीवन में ऊँघती,  देर रातों  की गुफ्तगू

स्वेटर  के बाज़ुओं  से लिपटी हुई, कफूरी गोलियों की खुश्बू

वो  नीली छतरी की तान से टपकता शोर गली के नुक्कड़ का

और तौलिए के  रेशों से झाँकती हुई बरामदे की  धूप

कागज़ी पुड़ियों पर रेंगती हुई खबरें पुराने अख़बारों की

और पुड़ियों  में भरे मसालों में नोक झोक रिश्तेदारों की

अचार  के डब्बों में बंद आपी की खट्टी- मीठी शरारतें

नमक चीनी की गठरियों में पड़ोसियों की हिकायतें

एक थाली और उसमें ज़ायका घर की दाल रोटी का

एक कढ़ाई और  दो बर्तन  भर  अम्मी की नसीहतें

एक चाय की प्याली और उसमें गुफ्त-ओ-शनीद फारिक शामों की

किताबों के सफो मैं क़ैद बाबा के उसूल और हिदायतें

एक ताबीज़ में यकीन इक़्बाल का और बड़े बुज़ुर्गों की तर्बियत

चन्द बुतो से बँधी हुई दीन की तालीम और रिवायतें

एक ऑल्बम में अतीत से चुराए हुए कुछ खुशनुमा लम्हे और चेहरे

एक डायरी में कुछ पते और फोन नंबर, ना भूलने के वादे, फिर मिलने के इरादे

एक CD में,  बड़े  ताग-ओ-दॉ से हासिल, मज्मुआह पसंदीदा ग़ज़लों का

कुछ तस्सल्ली खुश-अंजाम फिल्मों की और  पहले प्यार की यादें

बस एक  अटैची में समेट लाए थे ,हर ज़रूरत ज़िंदगी की

मगर अब ऐश-ओ-इशरात के इस जहान में ज़रूरतें मुक़म्मल ही नही होती

बस एक  अटैची में सिमट आयी थी, हर वजह साँस लेने की

मगर अब इस वसी मकान में भी दम घुटने लगा है

– कृत्या

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बाज़-दीद ( A return visit)

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मुद्दतों बाद लौटे हो,

जो तेरे आमद की खबर होती, तो तेरी यादों का इत्र छिड़क दिया होता पर्दों और ग़िलाफों पे

मायूसियत की बू दर-ओ-दीवार पर कब्ज़ा कर बैठी  है

जो तेरे आमद की खबर होती,  तो तेरी कुछ हिकायतों से दर-दरीचे रंग दिए होते

अर्सा-ए-हिज्र की मोटी सी परत आशनाई के सब रंग निगल गयी है

मुझे आइना देखे हुए भी बड़े दिन हो गए हैं

गुज़रा वक़्त सिमट आया है रू के सिलवटों में

पिछली बारिशों में पलकों के पुल टूट गए थे

इंतजार के कई मौसम बह गए

आँखों के किनारे कुछ धस से गए हैं

हाँ सफ़ेद होती ज़ुल्फ़ों की गिरहों में मैंने

क़ैद कर रखी है चांदनी तनहा रातों की

और चटपटे अचार की मर्तबान में सब से छुपाकर

थोड़ी सी ज़िन्दगी बचा रखी है

आओ बैठो, खुलती गिरहों की रौशनी में,

कुछ लम्हे परोस दूँ

-कृत्या

मुंतज़िर

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सर्द हवाओं से उलझ पड़ते हैं सूनी दरख्तों के ढाँचे
मुसलसल बादलों से लड़ती रहती है जाड़ों की गुनगुनी धूप
दराज़ रातों के बीच अब सिमटते दिन का जैसे दम निकलने लगा हो
तुम आ जाओ या अपने कुछ सुखन लौटते परिंदों के हवाले कर दो
सुना है तुम्हारी आमद से मौसम बदल जाया करते हैं
सुना है तुम्हारी बातों में रातें गुज़र जाया करती हैं
– कृत्या

इंतज़ार (II)

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सुनी जाती है हामी भर भर के हमराहों की दास्तान
रिश्तों की, तकरारों की, बनती गिरती सरकारों की
खेलों और खिलाड़ियों की, फिल्मों की कहानियों की
अमन की, लड़ाई की, बढ़ती हुई महँगाई की
मैं भी सग़ीर बातों से, गुफ़्तुगू भर देती हूँ
मेरे चंद नज़रियों को कुछ इत्मिनान हो जाता है
मेरी ख़ामोशी को मगर आज भी, तेरे तवज्जो का इंतज़ार रहता है
– कृत्या

इंतज़ार

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उबलते पानी के धुंध में, दिन झपकियां लेने लगता है
मेहँदी रची हथेली सा रंग, दूध पे चढ़ने लगता है
किसी बिसरी याद की तरह, चीनी घुल जाया करती है
थका हुआ चमच फिर, तश्तरी पे आराम फरमाता है,
सर्द-मेहरी से हर शाम ये रस्म निभायी जाती है
मेरी चाय की प्याली को पर आज भी, तेरे किस्सों का इंतज़ार रहता है
– कृत्या

एहसास-ए-जुर्म (Guilt)

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हर फैसला उसका ही तो था
मुलाक़ात की इल्तिजा भी, नागहाँ बेगानगी भी
मोहब्बत की इब्तिदा भी, आखरी अल्विदा भी
जाने क्यों फिर भी एहसास-ए-जुर्म से मेरा सुकून तबाह है
– कृत्या

 

कश्मकश

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तू झोंका है या तूफ़ान कोई, इसी कश्मकश में हूँ
तू उन हवाओं में भी है जो माथे को सहलाके, दिल को सुकून दे जाया करती हैं,
तू उन हवाओं में भी है जो मेरी सुलझी हुई दुनिया को, बग़ावत के रंगों से भर जाय करती हैं

 

तू बाराँ का हिस्सा है या मद्द का, इसी कश्मकश में हूँ
तू उन बूंदों में भी है जो मेरी रूखी शामों को मिट्टी की खुशबू से महका जाया करती हैं,
तू उन बूंदों में भी है जो लबरेज़ आँखों से बहकर, रू की रंगत बदल जाय करती हैं

तू आरज़ी है या मुस्तक़िल, इसी कश्मकश में हूँ,
तू उन वादों का ऐतबार भी है, जो ज़िन्दगी के आख़िरत तक निभाए जाते हैं,
तू उन वादों का हबीब भी है, जो न खुद सँभलते हैं ना संभाले जाते हैं.

तू ज़ाहिर है या मस्तूर, इसी कश्मकश में हूँ,
तू वो लफ्ज़ भी है, जिनको समझने में कोई पेंच-ओ-ख़म नहीं होता
तू लफ़्ज़ों के बीच की वो ख़ामोशी भी है, जो बयान होके भी बयान नहीं होती

तू ग़ैर या रफ़ीक़, इसी कश्मकश में हूँ,
तू वो शक्स भी है, जिसकी बातों की अबतरी में खो जाने का हिसास है
तू वो शक्स भी है, जिसकी बाहों के दायरे में हिफाज़त का एहसास है

– कृत्या

(That stormy evening, by the sea, while the city prepared for the much needed change from the ever rising heat, I sat there staring into the horizon, a thousand thoughts racing, what ifs and if onlys, a storm approaching, a storm within, no place to go, no where to hide,  should I embrace the clouds or hold on to the sun, I sat there without a clue, because you were to me both the storm and the sun, you were both chaos and order — this pic reminded me of that stormy evening, the confusion, us! What would life be if I had chosen differently? ) 
-Late summer sunset, Mumbai.