मेहर-ए-शायर (Love of a poet)

IMG_7751.JPG

शायद ज़माने को इश्क़ हो जाता हमसे, गर तेरा फितूर हम होते
शायद ज़माने से इश्क़ हो जाता हमें, गर मेरा सुरूर तुम होते
मैं ढल जाती तेरी तहरीरों में तेरे लफ़्ज़ों से ज़ीनत उधार लेकर
तुम मेरे शिकस्ताह जज़्बों को अपनी शोखियों से रंग गए होते
– कृत्या

The world would have fallen in love with me, and I would have learned to love the world,   if I were your love and  you were mine. I would blend into your compositions, embracing the beauty of your words, and you would have colored my disappointments with your cheerfulness. 

Advertisements

बस एक अटैची (just one suitcase)

IMG_1836-001

बस एक  अटैची में समेट लाए थे ,हर ज़रूरत ज़िंदगी की

नयी पुरानी कमीज़ों के सिलवटों में, तवज्जु  मालूफ हाथों का

वो गुल-पोश चादर और  उसमें बिखरी हुई, करवटें अलसाई  सुबहों  की

तकिये के गिलाफो के सीवन में ऊँघती,  देर रातों  की गुफ्तगू

स्वेटर  के बाज़ुओं  से लिपटी हुई, कफूरी गोलियों की खुश्बू

वो  नीली छतरी की तान से टपकता शोर गली के नुक्कड़ का

और तौलिए के  रेशों से झाँकती हुई बरामदे की  धूप

कागज़ी पुड़ियों पर रेंगती हुई खबरें पुराने अख़बारों की

और पुड़ियों  में भरे मसालों में नोक झोक रिश्तेदारों की

अचार  के डब्बों में बंद आपी की खट्टी- मीठी शरारतें

नमक चीनी की गठरियों में पड़ोसियों की हिकायतें

एक थाली और उसमें ज़ायका घर की दाल रोटी का

एक कढ़ाई और  दो बर्तन  भर  अम्मी की नसीहतें

एक चाय की प्याली और उसमें गुफ्त-ओ-शनीद फारिक शामों की

किताबों के सफो मैं क़ैद बाबा के उसूल और हिदायतें

एक ताबीज़ में यकीन इक़्बाल का और बड़े बुज़ुर्गों की तर्बियत

चन्द बुतो से बँधी हुई दीन की तालीम और रिवायतें

एक ऑल्बम में अतीत से चुराए हुए कुछ खुशनुमा लम्हे और चेहरे

एक डायरी में कुछ पते और फोन नंबर, ना भूलने के वादे, फिर मिलने के इरादे

एक CD में,  बड़े  ताग-ओ-दॉ से हासिल, मज्मुआह पसंदीदा ग़ज़लों का

कुछ तस्सल्ली खुश-अंजाम फिल्मों की और  पहले प्यार की यादें

बस एक  अटैची में समेट लाए थे ,हर ज़रूरत ज़िंदगी की

मगर अब ऐश-ओ-इशरात के इस जहान में ज़रूरतें मुक़म्मल ही नही होती

बस एक  अटैची में सिमट आयी थी, हर वजह साँस लेने की

मगर अब इस वसी मकान में भी दम घुटने लगा है

– कृत्या

बाज़-दीद ( A return visit)

IMG_7944.JPG

मुद्दतों बाद लौटे हो,

जो तेरे आमद की खबर होती, तो तेरी यादों का इत्र छिड़क दिया होता पर्दों और ग़िलाफों पे

मायूसियत की बू दर-ओ-दीवार पर कब्ज़ा कर बैठी  है

जो तेरे आमद की खबर होती,  तो तेरी कुछ हिकायतों से दर-दरीचे रंग दिए होते

अर्सा-ए-हिज्र की मोटी सी परत आशनाई के सब रंग निगल गयी है

मुझे आइना देखे हुए भी बड़े दिन हो गए हैं

गुज़रा वक़्त सिमट आया है रू के सिलवटों में

पिछली बारिशों में पलकों के पुल टूट गए थे

इंतजार के कई मौसम बह गए

आँखों के किनारे कुछ धस से गए हैं

हाँ सफ़ेद होती ज़ुल्फ़ों की गिरहों में मैंने

क़ैद कर रखी है चांदनी तनहा रातों की

और चटपटे अचार की मर्तबान में सब से छुपाकर

थोड़ी सी ज़िन्दगी बचा रखी है

आओ बैठो, खुलती गिरहों की रौशनी में,

कुछ लम्हे परोस दूँ

-कृत्या

मुंतज़िर

IMG_1980.JPG

सर्द हवाओं से उलझ पड़ते हैं सूनी दरख्तों के ढाँचे
मुसलसल बादलों से लड़ती रहती है जाड़ों की गुनगुनी धूप
दराज़ रातों के बीच अब सिमटते दिन का जैसे दम निकलने लगा हो
तुम आ जाओ या अपने कुछ सुखन लौटते परिंदों के हवाले कर दो
सुना है तुम्हारी आमद से मौसम बदल जाया करते हैं
सुना है तुम्हारी बातों में रातें गुज़र जाया करती हैं
– कृत्या

इंतज़ार (II)

Dec20161-001.jpg

सुनी जाती है हामी भर भर के हमराहों की दास्तान
रिश्तों की, तकरारों की, बनती गिरती सरकारों की
खेलों और खिलाड़ियों की, फिल्मों की कहानियों की
अमन की, लड़ाई की, बढ़ती हुई महँगाई की
मैं भी सग़ीर बातों से, गुफ़्तुगू भर देती हूँ
मेरे चंद नज़रियों को कुछ इत्मिनान हो जाता है
मेरी ख़ामोशी को मगर आज भी, तेरे तवज्जो का इंतज़ार रहता है
– कृत्या

इंतज़ार

img_1453

उबलते पानी के धुंध में, दिन झपकियां लेने लगता है
मेहँदी रची हथेली सा रंग, दूध पे चढ़ने लगता है
किसी बिसरी याद की तरह, चीनी घुल जाया करती है
थका हुआ चमच फिर, तश्तरी पे आराम फरमाता है,
सर्द-मेहरी से हर शाम ये रस्म निभायी जाती है
मेरी चाय की प्याली को पर आज भी, तेरे किस्सों का इंतज़ार रहता है
– कृत्या

एहसास-ए-जुर्म (Guilt)

img_7900

हर फैसला उसका ही तो था
मुलाक़ात की इल्तिजा भी, नागहाँ बेगानगी भी
मोहब्बत की इब्तिदा भी, आखरी अल्विदा भी
जाने क्यों फिर भी एहसास-ए-जुर्म से मेरा सुकून तबाह है
– कृत्या