इंतज़ार (II)

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सुनी जाती है हामी भर भर के हमराहों की दास्तान
रिश्तों की, तकरारों की, बनती गिरती सरकारों की
खेलों और खिलाड़ियों की, फिल्मों की कहानियों की
अमन की, लड़ाई की, बढ़ती हुई महँगाई की
मैं भी सग़ीर बातों से, गुफ़्तुगू भर देती हूँ
मेरे चंद नज़रियों को कुछ इत्मिनान हो जाता है
मेरी ख़ामोशी को मगर आज भी, तेरे तवज्जो का इंतज़ार रहता है
– कृत्या

इंतज़ार

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उबलते पानी के धुंध में, दिन झपकियां लेने लगता है
मेहँदी रची हथेली सा रंग, दूध पे चढ़ने लगता है
किसी बिसरी याद की तरह, चीनी घुल जाया करती है
थका हुआ चमच फिर, तश्तरी पे आराम फरमाता है,
सर्द-मेहरी से हर शाम ये रस्म निभायी जाती है
मेरी चाय की प्याली को पर आज भी, तेरे किस्सों का इंतज़ार रहता है
– कृत्या

एहसास-ए-जुर्म (Guilt)

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हर फैसला उसका ही तो था
मुलाक़ात की इल्तिजा भी, नागहाँ बेगानगी भी
मोहब्बत की इब्तिदा भी, आखरी अल्विदा भी
जाने क्यों फिर भी एहसास-ए-जुर्म से मेरा सुकून तबाह है
– कृत्या

 

कश्मकश

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तू झोंका है या तूफ़ान कोई, इसी कश्मकश में हूँ
तू उन हवाओं में भी है जो माथे को सहलाके, दिल को सुकून दे जाया करती हैं,
तू उन हवाओं में भी है जो मेरी सुलझी हुई दुनिया को, बग़ावत के रंगों से भर जाय करती हैं

 

तू बाराँ का हिस्सा है या मद्द का, इसी कश्मकश में हूँ
तू उन बूंदों में भी है जो मेरी रूखी शामों को मिट्टी की खुशबू से महका जाया करती हैं,
तू उन बूंदों में भी है जो लबरेज़ आँखों से बहकर, रू की रंगत बदल जाय करती हैं

तू आरज़ी है या मुस्तक़िल, इसी कश्मकश में हूँ,
तू उन वादों का ऐतबार भी है, जो ज़िन्दगी के आख़िरत तक निभाए जाते हैं,
तू उन वादों का हबीब भी है, जो न खुद सँभलते हैं ना संभाले जाते हैं.

तू ज़ाहिर है या मस्तूर, इसी कश्मकश में हूँ,
तू वो लफ्ज़ भी है, जिनको समझने में कोई पेंच-ओ-ख़म नहीं होता
तू लफ़्ज़ों के बीच की वो ख़ामोशी भी है, जो बयान होके भी बयान नहीं होती

तू ग़ैर या रफ़ीक़, इसी कश्मकश में हूँ,
तू वो शक्स भी है, जिसकी बातों की अबतरी में खो जाने का हिसास है
तू वो शक्स भी है, जिसकी बाहों के दायरे में हिफाज़त का एहसास है

– कृत्या

(That stormy evening, by the sea, while the city prepared for the much needed change from the ever rising heat, I sat there staring into the horizon, a thousand thoughts racing, what ifs and if onlys, a storm approaching, a storm within, no place to go, no where to hide,  should I embrace the clouds or hold on to the sun, I sat there without a clue, because you were to me both the storm and the sun, you were both chaos and order — this pic reminded me of that stormy evening, the confusion, us! What would life be if I had chosen differently? ) 
-Late summer sunset, Mumbai. 

Lime Butterfly

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This is an interesting butterfly, abundant in almost all tropical areas,  it has different flight patterns depending on the time of the day – from cool mornings to sunny afternoons to rainy evenings. Found this one near a pond next to a temple in Kerala.

Lime Butterfly, Kerala, India

Weekly Photo Challenge : Half-Light

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The tide was low, and it was dawn and while the pompous sun prepared for a grand opening of the day  with chirping birds and blooming flowers, lighting up the sky, dotted with staggered arrays of orange tinted clouds, the embarrassed moon with its borrowed light descended gradually to conclude the night, almost unnoticed, disappearing silently into the horizon. And while I have always waited for the sun rise, this one time I chose to keep the moon company as it set, and I am glad I did.  

Moon set at low tide, Cape Cod Bay, MA.

My entry for the weekly photo challenge : Half-Light

 

ग़ुरूब (Sunset)

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कभी देखा है दिन को ढलते हुए?

एक लकीर में सिमट जाती है बेचैन अर्श की अंगड़ियाँ जैसे

एक लकीर में सिमट जाती है मुतमइन फर्श की गहराइयाँ जैसे

वहीं उस उफ़ुक़ में मिल गयी हैं, हमारी पहली और आखरी मुलाक़ात की घड़ियाँ

एक लकीर ने तक़्सीम कर दी हम दोनो की तनहाईयाँ जैसे

 

उस उफ़ुक़ पर हर रोज़ तेरा तसव्वुर, भिड़ जाता हैं यादों के लुटेरों से

कभी फ़तेह मिलती है ज़ख़्मी तसव्वुर के दम पर

कभी शिकस्त की आड़ में यादें खो जाया करती हैं

दोनो ही सुरतों में तेरा वजूद मेरी ज़िंदगी से मिटने लगता है

 

अरसा-ए-जंग के इंतिहा पे,

मैं बिखरे तखय्युल के उधड़े सिरे चुन लेती हूँ

एक कच्ची-पक्की दास्तान हमारी फिर बुन लेती हूँ

कुछ हिस्से उस अफ़साने के आज भी महफूज़ है ज़ेहन में,

कुछ क़िस्से अब मगर सराबज़ार लगते हैं

 

मैं उन सराबों का पीछा करते हुए

सरहद-ए-होश पर आ पहुँची हूँ

यहाँ हर मुसाफिर मेरी ही तरह बदहाल है

किसे अब याद की ख़यालों में कितनी हक़ीक़त है,

किसे अब इल्म की हक़ीक़त में कितने ख़याल हैं

 

एक लकीर में सिमट आई हो हक़ीक़त की नाकामियाँ जैसे

एक लकीर में सिमट आई हो ख़यालों की नादानियाँ जैसे

कभी देखा है दिन को ढलते हुए?

हमारे रिश्ते जैसा लगता है

– कृत्या

अर्श – sky, मुतमइन – calm and content, फर्श – Earth, उफ़ुक़ – Horizon, तक़्सीम करना – to divide, अरसा-ए-जंग – duration of war, सराबज़ार – like a mirage, सराबों – mirages, सरहद-ए-होश – borders of rationality